बिश्नोई समाज: अमृता देवी का बलिदान

बिश्नोई समाज: अमृता देवी का बलिदान

‘कटे हुए पेड़ से ज्यादा सस्ता है कटा हुआ सिर’: 3 बेटियों के साथ बलिदान हुईं अमृता देवी, कुल 363 लोग कुल्हाड़ी से काटे गए, उसी समाज के लोगों का हुआ नरसंहार जिससे आता है गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई

1730 में महाराजा की ओर से आदेश आया कि नए महल के निर्माण के लिए खेजरली गाँव में लगे खेजड़ी के पेड़ों को काटा जाए… जब अमृता देवी को इसका पता चला तो वो अपनी तीन बेटियों के साथ सैनिकों के सामने आ खड़ी हुईं। सैनिक हैरान थे कि वृक्ष के बदले वो महिला अपनी बेटियों समेत अपनी जान देने को तैयार थीं।

यह आखिरी शब्द थे, उस महिला के लिए जो पेड़ ब​चाने के लिए बलिदान हो गईं। उनका नाम था- अमृता देवी बिश्नोई (Amrita Devi Bishnoi)। उनकी तीन बेटियाँ भी बलिदान हो गईं। कुल मिलाकर 363 लोगों का बलिदान हुआ। सबको कुल्हाड़ी से काटा (khejarli Massacre) गया था। ये सारे बलिदानी उसी बिश्नोई समाज से थे, जिस समाज का गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई (Lawrence Bishnoi) आजकल सुर्खियों में है।

अमृता देवी का बलिदान

बात 11 सितंबर 1730 की है। राजस्थान के शुष्क रेगिस्तान में प्रचुर मात्रा में खेजड़ी पेड़ों से भरा बिश्नोई समाज का एक खेजरली गाँव है। इस गाँव के लोग शुरुआत से ही वनस्पतियों को पूजनीय मानकर हमेशा उनकी पूजा करते हैं, जान देकर वृक्षों की रक्षा करते हैं। अमृता देवी बिश्नोई और बाकी 363 लोगों ने भी यही किया था। आज पूरा बिश्नोई समाज अपने पुरखों के बलिदान की कहानी बच्चे-बच्चे को सुनाता है। वहीं दुनिया उस घटना को ‘खेजरली नरसंहार’ के तौर पर जानती है।

Amrita Devi Bishnoi
Amrita Devi Bishnoi

इस नरसंहार के पीछे का कारण जोधपुर के तत्कालीन महाराजा अभय सिंह का एक आदेश बताया जाता है। 1730 में महाराजा की ओर से आदेश आया कि नए महल के निर्माण के लिए खेजरली गाँव में लगे खेजड़ी के पेड़ों को काटा जाए…आदेश सुन राजा के दूत बड़ी-बड़ी कुल्हाड़ी लेकर गाँव की ओर बढ़ने लगे। जब अमृता देवी को इसका पता चला तो वो अपनी तीन बेटियों के साथ राजा के लोगों के सामने आ खड़ी हुईं।

हाथ में कुल्हाड़ी लेकर पेड़ काटने आए पुरुष हैरान थे कि वृक्ष के बदले वो महिला अपनी बेटियों समेत अपनी जान देने को तैयार थी। उनकी बहादुरी को देख समाज के सैंकड़ों लोग उनके पीछे थे। अमृता देवी को समझाया गया लेकिन पर्यावरण के लिए उनका अटूट प्रेम, जान से बढ़कर था। उन्होंने वही बात कही जो आपने ऊपर पढ़ी–कटे हुए पेड़ से ज्यादा सस्ता है कटा हुआ सिर। वो पेड़ से लिपटी रहीं और आखिर में सैनिकों ने उनका सिर काटकर उनका शरीर चीर दिया। बेटियाँ स्तब्ध थीं। मगर उन्होंने भी वही किया जो माँ को करते देखा था।

अमृता देवी बिश्नोई और उनकी बेटियों के इस बलिदान की सूचना जब समाज के अन्य लोगों को मिली तो विरोध बढ़ गया। 83 गाँवों के बिश्नोई समाज के लोग वृक्षों को बचाने खेजरली पहुँचे और किसी ने जान की परवाह नहीं की। उन्होंने अहिंसक रास्ते पर चलते हुए अपनी वनस्पति बचाने की कोशिश की जिसके बाद कहा जाता है कि 49 गाँव के 363 लोग बलिदान हुए।

राजा ने बिश्नोई समाज से माँगी माफी, निकाला आदेश

इस बीच लड़की लाने का आदेश देने वाले राजा अभय सिंह को जब गाँव में चल रहे संघर्ष के बारे में पता चला, तब फौरन उन्होंने पेड़ काटने के आदेश को खारिज कर दिया। साथ ही बिश्नोई समाज के लोगों से न केवल माफी माँगी बल्कि एक आदेश जारी किया जिसके बाद इस समाज के लोगों के ग्रामों के आसपास पेड़ काटने और जानवर मारने पर रोक लगा दी गई।

साल बीते, दशक बीते, सदियाँ बीती। मगर सन् 1730 की यह घटना राजस्थान के लोग कभी नहीं भूले। नतीजतन खेजड़ी के पेड़ को प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक माना गया और 2013 में, पर्यावरण और वन विभाग ने 11 सितंबर को राष्ट्रीय वन शहीद दिवस के रूप में घोषित किया।

राजस्थान से बाहर अन्य़ समाज के लोग भी जानते हैं कि बिश्नोई समाज के लिए हर पौधा और जानवर मनुष्य जीवित प्राणी की तरह है। वह उन्हें संरक्षित करने के लिए किसी भी हद्द तक जाते हैं। बिश्नोइयों के उस प्रदर्शन का ही नतीजा था कि लोग प्रकृति को संरक्षित करने के लिए सचे हुए और हमने इतिहास में आगे चलकर टिहरी गढ़वाल में चिपको आंदोलन (1973), बिहार-झारखंड में जंगल बचाओ आंदोलन (1982), कर्नाटक के पश्चिमी घाट में अप्पिको चालुवली (1983) जैसे विरोध प्रदर्शन हुए। जिनका असर विदेशों तक देखने को मिला।

बिश्नोई समाज का परिचय

बता दें कि बिश्नोई समाज पश्चिमी थार रेगिस्तान और भारत के उत्तरी राज्यों में पाया जाने वाला समुदाय है। इसके संस्थापक जांभोजी महाराज है। बिश्नोई समाज उन्हें भगवान विष्णु का अवतार मान उनकी पूजा करता है। उन्हीं के संदेशों को पालन कर ये समाज जीवनयापन करता है और यही वजह भी है कि ये काले हिरण को इतना मानते हैं। कहा जाता है कि गुरु जंभेश्वर ने अपने अनुयायियों से कहा था कि वह काले हिरण को उन्हीं का स्वरूप मान कर पूजा करें। यही वजह है कि बिश्नोई हिरणों की खास रूप से पूजा करते हैं। बिश्नोई समाज का मुख्य मंदिर ‘मुक्तिधाम मुकाम’ भी राजस्थान के बीकानेर में है।

नोट: इस रिपोर्ट में जिस खेजरी पेड़ के बारे में बात हुई है उसके बारे में बता दें कि इसे शमी के पेड़ के नाम से भी जाना जाता है। ये सामान्यत: रेगिस्तान में मिलता है लेकिन इसकी खास बात है कि रेगिस्तान के शुष्क माहौल में भी ये पेड़ हरा-भरा रहता है। मरुस्थल में ये न लोगों को केवल ठंडी छाँव देकर गर्मी से बचाता है बल्कि इसके पात पशुओं का आहार बनते हैं।

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