सूर्य ढलता ही नहीं है – रामदरश मिश्र

सूर्य ढलता ही नहीं है – रामदरश मिश्र

चाहता हूं‚ कुछ लिखूँ‚ पर कुछ निकलता ही नहीं है
दोस्त‚ भीतर आपके काई विकलता ही नहीं है।

आप बैठे हैं अंधेरे में लदे टूटे पलों से
बंद अपने में अकेले‚ दूर सारी हलचलों से
हैं जलाए जा रहे बिन तेल का दीपक निरंतर
चिड़चिड़ा कर कह रहे– “कम्बख्त जलता ही नहीं है।”

बिजलियां घिरती‚ हवाए काँँपती‚ रोता अंधेरा
लोग गिरते‚ टूटते हैं‚ खोजते फिरते बसेरा
किंतु रह–रह कर सफर में‚ गीत गा पड़ता उजाला
यह कला का लोक‚ इसमें सूर्य ढलता ही नहीं है।

तब लिखेंगे आप जब भीतर कहीं जीवन बजेगा
दूसरों के सुख–दुखों से आपका होना सजेगा
टूट जाते एक साबुत रोशनी की खोज में जो
जानते हैं‚ जिंदगी केवल सफलता ही नहीं है।

बात छोटी या बड़ी हो‚ आँच में खुद की जली हो
दूसरों जैसी नहीं‚ आकार में निज के ढली हो
है अदब का घर‚ सियासत का नहीं बाज़ार यह तो
झूठ का सिक्का चमाचम यहां चलता ही नहीं है।

∼ रामदरश मिश्र

About Ramdarash Mishra

डॉ. रामदरश मिश्र (जन्म: १५ अगस्त, १९२४ गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत) हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। ये जितने समर्थ कवि हैं उतने ही समर्थ उपन्यासकार और कहानीकार भी। इनकी लंबी साहित्य-यात्रा समय के कई मोड़ों से गुजरी है और नित्य नूतनता की छवि को प्राप्त होती गई है। ये किसी वाद के कृत्रिम दबाव में नहीं आये बल्कि उन्होंने अपनी वस्तु और शिल्प दोनों को सहज ही परिवर्तित होने दिया। अपने परिवेशगत अनुभवों एवं सोच को सृजन में उतारते हुए, उन्होंने गाँव की मिट्टी, सादगी और मूल्यधर्मिता अपनी रचनाओं में व्याप्त होने दिया जो उनके व्यक्तित्व की पहचान भी है। गीत, नई कविता, छोटी कविता, लंबी कविता यानी कि कविता की कई शैलियों में उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा ने अपनी प्रभावशाली अभिव्यक्ति के साथ-साथ गजल में भी उन्होंने अपनी सार्थक उपस्थिति रेखांकित की। इसके अतिरक्त उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रावृत्तांत, डायरी, निबंध आदि सभी विधाओं में उनका साहित्यिक योगदान बहुमूल्य है।

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