तन बचाने चले थे: रामावतार त्यागी

तन बचाने चले थे: रामावतार त्यागी

तन बचाने चले थे कि मन खो गया
एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया।

घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही
और सब कुछ है वातावरण खो गया।

यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया
गाँव का जो दिया था वचन खो गया।

जो हज़ारों चमन से महकदार था
क्या किसी से कहें वह सुमन खो गया।

दोस्ती का सभी ब्याज़ जब खा चुके
तब पता यह चला, मूलधन ही खो गया।

यह जमीं तो कभी भी हमारी न थी
यह हमारा तुम्हारा गगन भी अब खो गया।

हमने पढ़कर जिसे प्यार सीखा था कभी
एक गलती से वह व्याकरण भी खो गया।

रामावतार त्यागी

आपको रामावतार त्यागी जी की यह कविता “तन बचाने चले थे” कैसी लगी – आप से अनुरोध है की अपने विचार comments के जरिये प्रस्तुत करें। अगर आप को यह कविता अच्छी लगी है तो Share या Like अवश्य करें।

यदि आपके पास Hindi / English में कोई poem, article, story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें। हमारी Id है: submission@sh035.global.temp.domains. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ publish करेंगे। धन्यवाद!

Check Also

Tron: Ares - 2025 American Sci-Fi Action Film Trailer, Review

Tron: Ares – 2025 American Sci-Fi Action Film Trailer, Review

Movie Name: Tron: Ares Directed by: Joachim Rønning Starring: Jared Leto, Evan Peters, Jodie Turner-Smith, …